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हमने आईसीआईसीआई बैंक से एक लोन क्या ले लिया रोजाना की चख चख मोल ले ली। आये दिन टेलीमार्केटियरों के फोन। इनसे निपटने को समीर भाई का बताया कविता सुना डालने का आईडिया भी काम नहीं आया। अब इनसे निजात मिलने वाली है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्रधिकरण ने काल नहीं करें रजिस्ट्री बन दी है। आप तुरन्त अपने अपने टेलीकाम आपरेटर को फोन खड़काईये और कहिये कि वो आपको और ये दे दनादन काल करवा करवा कर परेशान न करायें।

और अधिक जानकारी चाहिये तो http://ndcregistry.gov.in पर जायें।


आज सुबह सुबह बहुत अच्छी खबर आयी है कि शिबू सोरेन को दिल्ली हाईकोर्ट ने बरी करार दे दिया। जिन सबूतों के आधार पर शिबू सोरेन को निचली अदालत ने सजा सुनाई थी उन्हें हाईकोर्ट के न्यायमूर्तियों ने नाकाफी माना है और सीबीआई को लताड़ लगाई है।
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सभी नेता, एमपी, एमेले बहुत भले लोग होते हैं। यदि बुरे होते तो जनता उन्हें चुनकर क्यों भेजती? हमारे कुंडावाले राजा भैया भी बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं। इनके साथ के सभी लोग भी बहुत ही सज्जन पुरुष हैं। इन्हें मायावती ने पहले भी रंजिशवश फंसाया था और अब भी फंसा रही है। बेचारे डीपी यादव के बारे में पता कीजिये, लाखों लोग कसम खाकर कहेंगे कि बहुत ही सत्पुरुष हैं।

यदि ये नेता लोग बेईमान होते तो क्या आजादी के सठियाने तक एक भी नेता को सजा नहीं होती? लोग तो इन भले लोगों के खिलाफ अंट शंट ही बकते रहते हैं।

आप कितना भी सबूत जुटा लें जिन सबूतों के आधार पर एक आम आदमी जिन्दगी भर के लिये नप जाय उतने तो नेताओं को एक महीने के लिये भी अन्दर नहीं कर पाते।

जब हमारे नेता, एमपी, एमेले भले हैं ही तो इनके खिलाफ कोई केस भी क्यों दायर किया जाय? एक कानून बना देना चहिये कि जितने भी एमपी, एमेले हैं और इनके जितने भी इर्द गिर्द के चंगू मंगू हैं, इनको कानूनन सद्पुरुष मान लिया जाय और इनके खिलाफ आजीवन कोई भी कैसा भी मामला नहीं चलाया जाय।

आखिर भईया पईसा तो हम आनेस्ट टैक्सपेयर का ही लगता ना?


क्या आपने सड़कों पर सरकारी ड्राइवर को कारें कुदाते देखा है? सरकारी कारों के ड्राइवरों और इनमें बैठे छोटे नौकरशाहों की बातें तो छोड़िये बड़े बड़े दानिशमंद भी कैसी कैसी मूर्खता करते रहते हैं। मैंने पढ़ा था कि एक बार तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त शेषन कैसे अपने ड्राइवर की गलती होने पर भी सामने वाले से उलझ पड़े थे। (बाद में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार कर ली थी)

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एक दृश्य की कल्पना कीजिये।
एक चौराहे पर सरकारी गाड़ी जा दौड रही है और सिगनल अचानक लाल हो जाता है।
क्या सिगनल अचानक लाल होता है? नहीं पहले ये काफी देर तक पीला रहता है। कुछ बेलगाम ड्राइवर होते हैं जिनके बेलगामी आखों को ये सिगनल पीला होते नहीं दिखता। पीछे बैठे नौकरशाह भी शायद ये नहीं जानते कि सिगनल पीला होता है। वे भी यही मान लेते हैं कि सिगनल अचानक लाल होगया। लेकिन दूसरी ओर से आ रही गाड़ियों के कारण ये गाड़ी चौराहा पार नहीं कर पाती और रिवर्स होती है।

लेकिन रिवर्स होते समय ड्राइवर को क्या पीछे नहीं देखना चाहिये? नहीं बेलगाम बेबकूफ ड्राइवर पीछे बिना देखे रिवर्स करते हैं, तब भी नहीं चौंकते जब पीछे की गाड़ी जोर से हार्न दे रही होती है। गाड़ी पीछे की गाड़ी से टकरा जाती है।

पीछे की गाड़ी सरकारी गाड़ी नहीं है। उसे उस कार के मालिक ने अपने खुद के पैसे से खरीदा है। इसकी कीमत सरकारी पैंसिलों से लेकर सरकारी वाहनों की सुविधा का दुरुपयोग करने वाले नहीं जान सकते।

क्या करना चाहिये एसे समय पर इस ड्राइवर और इसमें बैठे व्यक्ति को? लेकिन मजे की बात देखिये कि पीछे बैठा व्यक्ति सिर्फ ये देखता है कि पीछे की गाड़ी का पैन्ट पेन्ट उतरा है कि नहीं!

यदि आप इस परिस्थिति में होंगे तो उस महिला से शालीनता पूर्वक मांफी मांगेगे या उससे ठेठ अंग्रेजी में पैनकार्ड के बारे में पूछेंगे? यदि कोई व्यक्ति एसा करता है उस पर हंसेगे या उसके इस व्यवहार पर तालियां बजायेंगे?

और हां। यदि आपकी गाड़ी को कोई मूर्खता पूर्वक बैक करते समय ठोक दे तो आप क्या करेंगे? बोलेंगे कि भाई साहब बहुत अच्छा किया। गले का उपयोग तो कतई मत कीजिये क्योंकि तत्वबोध है कि जिनके ऊपर की मंजिल खाली होती है वही गले का भरपूर उपयोग करते हैं।

और ये रहा रीयल तत्वबोध

  • कुछ लोग ये सोचते हैं कि यदि वो अंग्रेजी बोलेंगे तो सामने वाले पर रुआब पड़ेगा। एसा सोचते समय उनके अन्दर अपनी भाषा के प्रति हीन भावना काम कर रही होती है
  • अभिजात्यता सरकारी पदों से पैसे से या पढ़ाई से नहीं आ जाती। कुछ लोग सिर्फ पैसे या सरकारी पद के कारण अपने आपको अभिजात्य समझने लगते हैं। ये अभिजात्यता नहीं बल्कि दंभ होता है।
  • प्रेमचन्द की कहानी नशा याद कीजिये। एक व्यक्ति जमींदार के बेटे के सिर्फ कुछ दिन साथ रहकर अपने आपको जमींदार समझने लगता है। छोटे नौकरशाह भी एसे ही होते हैं।
  • नौकरशाहों को उनकी असली हैसियत उनके रिटायरमेंन्ट के बाद पता चलती है। उनके लिये तब उनके घर में भी जगह नहीं होती। सुबह शाम सिर्फ पार्क में ही उनका बसेरा होता है।
  • आवाज का उपयोग न करने वालों की ऊपरी मंजिल नहीं खाली होती बल्कि वे गूंगे, कायर या दब्बू होते हैं।
  • निम्न वर्ग, मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग या उच्च वर्ग का वर्गीकरण सही नहीं है। कोई भी व्यक्ति किसी भी वर्ग में रहकर दानिशमंद या मूर्ख हो सकता है।
  • और एक प्रश्न
    किसी महिला की लक्जरी गाड़ी और पर्स को दस साल बाद भी प्रतीक के रूप में याद रखने वाले व्यक्ति को आप क्या कहेंगे?


    एक देश में एक नौकरशाह अपना आसाम का झूठा पता (द्वारा श्रीमती हितेश्वर सैकिया) देकर राज्यसभा का सीट हथिया सकता है. कोई नहीं पूछता कि उनका श्रीमती हितेश्वर सैकिया के घर में किस हैसियत से रहना था।

    एक देश में एक नामी वकील केवल राज्यसभा की कुर्सी के लिये पटना का झूठा पता लिखाता है. सारे टेलिविजन चैनल न जाने किस बिल में घुस जाते हैं।

    एक देश में जनहित याचिकाओं की बाढ़ लगाने वाले बेहद ईमानदार कहलाने वाले बाप का ईमानदार बेटा लखनऊ का झूठा पता देता है, क्यों? राज्य सभा की कुर्सी के लिये।

    उसी देश का एक अभिनेता अपने बाप दादा के गांव के उसी घर का पता देता है जिसमें उसके पिता हरिवंश राय पैदा हुये और रहते रहे, तो गलत?

    नई सरकार के आने पर एक “अति उत्साही” अपर आयुक्त बिना दूसरे पक्ष को सुनवाई का मौका दिये न्याय के मूल आत्मा का हनन करके एकतरफा फैसला सुना देता है और सारे चैनल बकर बकर भौं भौं करने लगते हैं।

    क्यों?

    और तो और सरकारी वकील बाकायदा टेलिविजन चैनल पर ही कैमरे को जज समझकर अपना मुकदमा पेश करने लगता है. ये सब क्या है?