Archive for the 'कविताई' Category
हरिजन गाथा-2
(हरिजन गाथा का पहले का भाग यहां बांचा गया था, शेष भाग बांचा जा रहा है)
“सुनते हो”, बोला खदेरन
“बुद्धू भाई, देर नहीं करनी है इसमें
चलो, रख बच्चे को रख आवें
बतला गये हैं गुरु महाराज
बचे को मां सहित हटा देना है कहीं
फौरन बुद्धू भाई
बुद्धू ने माथा हिलाया
खदेरन की बात पर
एक नहीं, तीन बार
बोला मगर एक शब्द [...]
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हरिजन गाथा-1
(हरिजन गाथा बाबा की दिल को छू जाने वाली कृति है़। ये है तो तीन भागों में पर आपकी सुविधा के लिये इसे दो हिस्सों में प्रस्तुत किया जा रहा है।)
एसा तो कभी नहीं हुआ था
महसूस करने लगीं वे
एक अनौखी बैचेनी
एक अपूर्व आकुलता
उनकी गभकुक्षियों के अंदर
बार बार उठने लगीं टीसें
लगाने लगे दौड़ उनके भ्रूण
अंदर [...]
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कम्युनिज्म के पंडे
(बाबा नागार्जुन से पहली बार मेरा साबका दिल्ली में कमानी आडिटोरियम के बाहर हुआ था। वे जमीन पर बैठे थे और मैंने उन्हें पहचान लिया था। उनके चरण स्पर्श करके बस कुछ बात होने वाली ही थीं कि नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के कुछ स्टूडेन्ट आ गये थे और बाबा को ले गये [...]
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स्त्री
कहते हैं
खुदा ने बनाया इसे,
आदमी के शरीर से अलग करके,
शायद आदमी जैसी ही होगी ये
खुश होती होगी, मचलती होगी,
रोती होगी,
इसे भी दर्द होता होगा,
ये भी कराहती होगी.
लेकिन तुमने रखा इसे.
व्यक्ति की परिभाषा से बाहर
रास्ते चलती औरत पर
तुम कसते रहे ताने,
छेड़ते रहे, खरीदते रहे, बेचते रहे,
तुम्हारे लिये ये है पण्य़ वस्तु
तुम्हारी मां [...]
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