क्या आपने सड़कों पर सरकारी ड्राइवर को कारें कुदाते देखा है? सरकारी कारों के ड्राइवरों और इनमें बैठे छोटे नौकरशाहों की बातें तो छोड़िये बड़े बड़े दानिशमंद भी कैसी कैसी मूर्खता करते रहते हैं। मैंने पढ़ा था कि एक बार तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त शेषन कैसे अपने ड्राइवर की गलती होने पर भी सामने वाले से उलझ पड़े थे। (बाद में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार कर ली थी)
एक दृश्य की कल्पना कीजिये।
एक चौराहे पर सरकारी गाड़ी जा दौड रही है और सिगनल अचानक लाल हो जाता है।
क्या सिगनल अचानक लाल होता है? नहीं पहले ये काफी देर तक पीला रहता है। कुछ बेलगाम ड्राइवर होते हैं जिनके बेलगामी आखों को ये सिगनल पीला होते नहीं दिखता। पीछे बैठे नौकरशाह भी शायद ये नहीं जानते कि सिगनल पीला होता है। वे भी यही मान लेते हैं कि सिगनल अचानक लाल होगया। लेकिन दूसरी ओर से आ रही गाड़ियों के कारण ये गाड़ी चौराहा पार नहीं कर पाती और रिवर्स होती है।
लेकिन रिवर्स होते समय ड्राइवर को क्या पीछे नहीं देखना चाहिये? नहीं बेलगाम बेबकूफ ड्राइवर पीछे बिना देखे रिवर्स करते हैं, तब भी नहीं चौंकते जब पीछे की गाड़ी जोर से हार्न दे रही होती है। गाड़ी पीछे की गाड़ी से टकरा जाती है।
पीछे की गाड़ी सरकारी गाड़ी नहीं है। उसे उस कार के मालिक ने अपने खुद के पैसे से खरीदा है। इसकी कीमत सरकारी पैंसिलों से लेकर सरकारी वाहनों की सुविधा का दुरुपयोग करने वाले नहीं जान सकते।
क्या करना चाहिये एसे समय पर इस ड्राइवर और इसमें बैठे व्यक्ति को? लेकिन मजे की बात देखिये कि पीछे बैठा व्यक्ति सिर्फ ये देखता है कि पीछे की गाड़ी का पैन्ट पेन्ट उतरा है कि नहीं!
यदि आप इस परिस्थिति में होंगे तो उस महिला से शालीनता पूर्वक मांफी मांगेगे या उससे ठेठ अंग्रेजी में पैनकार्ड के बारे में पूछेंगे? यदि कोई व्यक्ति एसा करता है उस पर हंसेगे या उसके इस व्यवहार पर तालियां बजायेंगे?
और हां। यदि आपकी गाड़ी को कोई मूर्खता पूर्वक बैक करते समय ठोक दे तो आप क्या करेंगे? बोलेंगे कि भाई साहब बहुत अच्छा किया। गले का उपयोग तो कतई मत कीजिये क्योंकि तत्वबोध है कि जिनके ऊपर की मंजिल खाली होती है वही गले का भरपूर उपयोग करते हैं।
और ये रहा रीयल तत्वबोध
और एक प्रश्न
किसी महिला की लक्जरी गाड़ी और पर्स को दस साल बाद भी प्रतीक के रूप में याद रखने वाले व्यक्ति को आप क्या कहेंगे?
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क्या बात है शिल्पा जी लगता है आप भी इस दंभ का शिकार रही है कभी..लेकिन बात दोनो और से हो सकती है..सच यही है जो मारे सो मीर.. कल एक साहब अपनी गाडी को जल्दी के चक्कर मे मेरी गाडी से भिडा कर चल दिये मैने प्रतिरोध किया..उनहोने आखो के इशारे से गल्ती महसूस की और निकल लिये.पर अगले १० मिनट मे मै उन्के मोहल्ले मे था ..तो वह जनाब मेरॊ गाडी साईड मे रुकवा कर मुझसे अपनी गाडी रिपेयर करवाने की कोशिश मे लग गये..जब मैने दो फ़ोन कर वहा लोग इक्कठे कर लिये तो फ़िर अपनी गलती मान ली जी..और फ़िर अपनी जान बचाने के चक्कर मे लग गये..(भाई तब मैने भी उनसे पैसे की मांग शुरु करदी थी ना)
“यदि आप इस परिस्थिति में होंगे तो उस महिला से शालीनता पूर्वक मांफी मांगेगे या उससे ठेठ अंग्रेजी में पैनकार्ड के बारे में पूछेंगे? यदि कोई व्यक्ति एसा करता है उस पर हंसेगे या उसके इस व्यवहार पर तालियां बजायेंगे?”
मैं आपसे एक प्रश्न करता हूं…आप अगर उस महिला की जगह होंगी तो आप डांटते हुए क्या ये बात कहेंगी कि आप आनेस्ट इनकम टैक्स पेयर हैं?…और अगर ऐसी बात कहकर रौब जामायेंगी तो आपसे सामनेवाला क्या सवाल करेगा?
दूसरी बात ये है कि किसी की लिखी गई पोस्ट के खिलाफ में तुरंत एक पोस्ट लिख देना कहां की समझदारी है?…आप तो पढाती हैं…किसी को अपनी बात कहने का हक है, ये बात समझना क्या इतना कठिन है, कि आपने तुरंत एक पोस्ट लिख डाली…या आप एक महिला बनकर किसी पुरुष ब्लागर को जवाब देना चाहती हैं?
यह तत्वबोध तो हक़ीक़त है। इस तरह के वाकये से निपटने के लिए आपने कुछ किया हो, या आपको कोई तरीका सही लगता हो, तो वह भी बताएँ।
अक्सर हम गलत हरकतों को बर्दाश्त कर लेते हैं या नजरंदाज कर देते हैं। क्योंकि हमें लगता है कि ऐसा करना ही समझदारी है। क्यों बेकार में अपना समय, अपनी ऊर्जा और अपना पैसा खराब किया जाए, परेशानी क्यों मोल लें। हमारी इस सोच के कारण गलत हरकतों पर काबू पाने की कोशिश भी शुरू नहीं होती।
लेकिन, यदि हममें से कुछ परेशानी उठाने को तैयार हो जाएं तो ऐसा नहीं है कि गलत हरकत करने वालों की हेकड़ी पस्त न हो सके, उनपर लगाम न लग सके।
“निम्न वर्ग, मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग या उच्च वर्ग का वर्गीकरण सही नहीं है। कोई भी व्यक्ति किसी भी वर्ग में रहकर दानिशमंद या मूर्ख हो सकता है।”
आप शत प्रतिशत सही कह रही हैं. दानवत्व या देवत्व किसी वर्ग विशेष की बपौती नहीं होता.
और आपने सोचने के लिये बहुत कुछ दिया है - उदाहरण के लिये “नौकरशाहों को उनकी असली हैसियत उनके रिटायरमेंन्ट के बाद पता चलती है।” तो हमेशा याद रहना चाहिये.
मैं आपके रीयल तत्व बोध से - हर एक बिन्दु से सहमत हुये बिना नहीं रह सकता.
मेरी औकात का स्मरण कराने के लिये - जो मैं हमेशा करता रहना चाहता हूं - के लिये अतिशय धन्यवाद. और यह लिखने में किसी प्रकार का दुराव या कुढ़न नहीं है, मै पूरी ईमानदारी से लिख रहा हूं. आप उसपर भरोसा करें.
शिल्पा जी .. बड़े दिनों बाद लिखा आपने.. और आते ही एक महारथी को लपेट दिया.. ज्ञान जी बड़े सम्मानित चिट्ठाकार हैं.. रोज़ सुबह ६ और ७ के बीच उनकी हलचल एक्सप्रेस आ जाती है.. और दस बजे तक दस बारह लोग टिप्पणी बोगी में सवार मिलते हैं.. अब उनके प्रति लोगों की गहरी आस्था का ही नतीजा है कि आप की पोस्ट अभी तक कोरी दिख रही है..
आपने घटना का दूसरा पक्ष दिखाकर सच्चाई की एक बड़ी तस्वीर बनाई है.. पर ज्ञान जी पर कोई खास गुस्सा था क्या आपका? ये बात शायद और तरीके से भी हो जाती.. वैसे मरज़ी आपकी..
आप के अंदाज़ पर लोगों को ऎतराज़ ज़रूर हो सकता है.. पर बात में आपकी दम है..
लो कल्लो बात, अतने दिन तो आप खामोश थीं और बोलीं तो फ़िर ……
ज्ञान जी ने एक नज़रिया रखा और आपने दूसरा पर इसमे किसी व्यक्ति विशेष पर गुस्सा होने वाली बात समझ में नही आई!!
बीच-बीच में ऐसा लिखते रहा कीजिए, भई.. अंदाज़ कभी थोड़ा तल्ख़ हो जाये उसपर न जाइए, बात कहते रहना ज़रूरी है..
मेडम सही लेप्टा है. आपकी गाडी के आसपास मैं नहीं फ़टकने वाला
चलिये आपने लिखा हमने पढ़ लिया मगर गुरुरमंद लोगों का अपना अलग वर्ग होता है, उसे इस तरह न जोड़ें. वो इसमें से किसी भी वर्ग से आ सकते हैं. वर्ना BMW नन्दा काण्ड, सलमान खान ड्राईविंग काण्ड और सिरियल किलर फुटपाथियों को पत्थर से सिर फोड़ देने वाले को कैसे जोड़ पायेगी.
सभी तो एक सा कार्य कर गये-अमानविय और असंवेदनशील. इस ढ़ंग से वर्गीकरण उचित सा नहीं प्रतीत नहीं होता.
एक बार और विचार करियेगा, बस गुजारिश है. बाकि तो सब ठीक है.
मैं न तो ज्ञान जी के लेख की तरफदारी कर रहा हूँ और न ही आपके लेख की खिलाफत-यह मेरा स्वभाव नहीं. बस अपनी सोच रख रहा हूँ.
आपने विचारा, जो अति आवश्यक है. इसे जारी रखें. शुभकामनायें.
श्री समीर, मैं भी आपसे सहमत हूं। मेरे तत्वबोध का अंतिम वाक्य ही है कि “कोई भी व्यक्ति किसी भी वर्ग में रहकर दानिशमंद या मूर्ख हो सकता है। ”
श्री अरुण आपने कितने पैसे वसूल लिये
श्री सुदर्शन, हां हर सरकारी उद्दंडता को रोकने के लिये सभी कहते हैं कि हमारे टैक्स के दिये पैसे पर पल रहे हो। क्या आप पहली नजर में नहीं देख सकते कि कौन गलती पर है? गाड़ी को बिना देखे रिवर्स करके ठोकने वाला या वो महिला जिसकी गाड़ी आगे से छू भर दी गयी ?
अपनी गलती होने पर भी किसी एक वर्ग के खिलाफ अभद्रता या रुक्षता का फतवा दे देना आपकी नजर में सही है? यदि एक को अपनी बात कहने का हक है तो दूसरे के लिखे हुये की समझदारी पर सवाल उठने वाले आप कौन है?
श्री सृजन, सही बातें तो आप बताईये क्योंकि फ्रेन्ड फिलॉसफर और गाईड तो आप हैं:).
श्री प्रमोस, श्री रमेश एवं श्री ज्ञानदत्त, धन्यवाद.
श्री अभय, मेरी बात में दम देखने के लिये शुक्रिया।
सरलीकरण की लोगों की आपत्ति खारिज करने लायक तो नहीं है पर उठाए गए सवाल सिर्फ दम वाले ही नहीं हैं वरन जरूरी भी हैं-
पेनकार्ड की जुगत केवल प्रत्युत्पन्नमति ही नहीं यह अनिवार्यत एक सत्ताई चेतना है जो मुख्यधाराई प्रवाह में स्वमेव होती ही है हाशिए के लिए। और स्टीरियोंटाईप्स का सवाल तो है ही जिसे प्रत्यक्षा उठा रही हैं।
आप का ऊपर का माला खाली नहीं है बस सिर्फ इतना है कि आप सवाल उठाए ये बात हमेशा जबाब (और पैनकार्ड जैसे पहचान चिह्न) मांगने वाली जमात को पच नहीं रहे हैं।
शिल्पा जी बहुत सही लिखा है आपने ! उपर के खाली माले की ओर इशारा करने वाले और पेनकार्ड धारी प्रथम कोटि के सामाजिकों ? बजुर्गवार अफसरशाहों की जेंडर सेंसिटिविटी पर इतना करारा व्यंग्य ! पचेगा नहीं ! रहम करिए जरा…
आपकी बात में दम है और तत्वबोध में वजनदारी. दम के साथ पर्याप्त तल्खी-तुर्शी भी . उकसावे में न आइएगा और ऐसे ही ईमानदारी से लिखती रहिएगा,संभव हो तो थोड़ी कम तल्खी के साथ . पर लिखती रहिएगा .