हरिजन गाथा-1
(हरिजन गाथा बाबा की दिल को छू जाने वाली कृति है़। ये है तो तीन भागों में पर आपकी सुविधा के लिये इसे दो हिस्सों में प्रस्तुत किया जा रहा है।)
एसा तो कभी नहीं हुआ था
महसूस करने लगीं वे
एक अनौखी बैचेनी
एक अपूर्व आकुलता
उनकी गभकुक्षियों के अंदर
बार बार उठने लगीं टीसें
लगाने लगे दौड़ उनके भ्रूण
अंदर ही अंदर
एसा तो कभी नहीं हुआ था
एसा तो कभी नहीं हुआ था कि
हरिजन मातायें अपने भ्रूणों के जनकों को
खो चुकी हों, एक पैचाशिक दुष्कांड में
एसा तो कभी नहीं हुआ था….
एसा तो कभी नहीं हुआ था
एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं
तेरह के तेरह अभागे
अकिंचन मनुपुत्र
जिंदा झोंक दिये गये हों
प्रचंड अग्नि की विकराल लपटों में
साधन सम्पन्न ऊंचीं जातियोंवाले
सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा
एसा तो कभी नहीं हुआ था
एसा तो कभी नहीं हुआ था
महज दस मील दूर पड़ता हो थाना
और दारोगा जी तक बार बार
खबरें पहुंचा दी गईं हों,
संभावित दुर्घटनाओं की
और,
निरंतर कई दिनों तक
चलती रही हो तैयारियां, सरेआम
किरासिन के कनस्तर, मोटे मोटे लक्कड़
उपलों के ढेर, सूखी घास-फूल के पूले
जुटाये गये हों उल्लासपूर्वक
और एक विराट चिताकुंड के लिये
खोदा गया हो गड्ड़ा, हंस हंस कर
और ऊंची जातियों वाली वो समस्त आबादी
आ गई हो होली वाले “सुपर मौज” के मूड में
और इस तरह जिंदा झोंक दिये गये हों
तेरह के तेरह अभागे मनुपुत्र
सौ सौ भाग्यवान मनुपुत्रों द्वारा
एसा तो कभी नहीं हुआ था
एसा तो कभी नहीं हुआ था
चकित हुये दोंनों वयस्क बुजुर्ग
एसा नव जातक
न तो देखा था, न सुना ही था आजतक
पैदा हुआ है दस रोज पहले अपनी बिरादरी में
क्या भला करेगा आगे चलकर
रामजी के आसरे जी गया अगर
कौन सी माटी गौड़ेगा?
कौन सा ढेला फोड़ेगा?
मग्गह का यह बदनाम इलाका
जाने कैसा सलूक करेगा इस बालक से
पैदा हुआ है बेचारा
भूमिहीन, बंधुआ मजदूरों के घर् में
जीवन गुजारेगा, हैवान की तरह
भटकेगा जहां-तहां बनमानुस जैसा
अधपेटा रहेगा, अधनंगा डोलेगा
तोतला होगा कि साफ साफ बोलेगा
जाने क्या करेगा
बहादुर होगा कि बेमौत मरेगा
फिक्र की तलैया में खाने लगे गोते
वयस्क बुजुर्ग दोनों, एक ही बिरादरी के हरिजन
सोचने लगे बार बार
कैसे तो अनौखे हैं अभागे के हाथ पैर
राम जी ही करेंगे इसकी खैर
देखो तो कैसा मुलुर मुलुर देख रहा शैतान
सोचते रहे बार बार
हाल ही में घटित हुआ था वो विराट दुष्कांड
झोंक दिये गये थे तेरह निरपराध हरिजन
सुसज्जित चिता में….
यह पैचाशिक नरमेघ
पैदा कर गया है, दहशत जन जन के मन में
इन बूढ़ों की तो उड़ ही गयी है नींद तब से
बाकी नहीं बचे हैं पलकों के निशान
देखते हैं दृगों के कोर ही कोर
देती है जब तब पहरा पपोटों पर
सील मुहर सूखी कीचड़ की
उनमें से एक बोला दूसरे से
बच्चे की हथेलियों के निशान
दिखलायेंगे गुरुजी से
वो जरूर कुछ न कुछ बतलायेंगे
इनकी किस्मत के बारे में
देखो तो ससुरे के कान हैं कैसे लम्बे
आंखें हैं छोटी पर कितनी तेज हैं
कैसी तेज रौशनी फूट रही है इनसे
सिर हिलाकर और स्वर खींचकर
बुद्धू ने कहा
हां जी खदेरन
गुरू जी ही देखेंगे इसको
बतायेंगे वही इस कलुये की किस्मत के बारे में
चलो चलें, बुला लावें गुरु महाराज को
पास खड़ी थी दस साल की छोकरी
दद्दू के हाथों से ले लिया शिशु को
संभलकर चली गई झोंपड़ी के अंदर
अगले नहीं, उससे अगले रोज
पधारे गुरु महाराज
रैदासी कुटिया के अधेड़ संत गरीबदास
बकरीवाली गंगा-जमनी दाड़ी थी
लटक रहा था गले से
अंगूठानुमा जरा सा टुकड़ा तुलसी काठ का
कद था नाटा, सूरत थी सांवली
कपार पर, बांईं तरफ घोड़े के खुर का निशान था
चेहरा था गोल – मटोल
आंखे थीं घुच्ची
बदन कठमस्त था
एसे आप अधेड़ संत गरीबदास पधारे
चमार टोली में…
अरे भगाओ इस बालक को, होगा यह भारी उत्पाती,
जुलुम मिटायेगे धरती से, इसके साथी और संघाती।
यह उन सबका लीडर होगा नाम छपेगा अखबारों में,
बड़े बड़े मिलने आयेंगे, लद लद कर मोटर कारों में।
खान खोदने वाले सौ सौ, मजदूरों के बीच पलेगा,
युग की आंचों में फौलादी, सांचे सा यह वहीं ढलेगा।
इसे भेज दो झरिया – फरिया, मां भी शिशु के साथ रहेगी,
बतला देना अपना असली, नाम पता कुछ नहीं कहेगी।
आज भगाओ, अभी भगाओ, तुम लोगों के मोह न घेरे,
होशियार इस शिशु के पीछे, लगा रहे हैं गीदड़ फेरे।
बड़े बड़े इन भूमिघरों को, यदि इसका कुछ पता चल गया,
दीन हीन छोटे लोगों का, समझो फिर दुर्भाग्य छल गया।
जनबल धनबल सभी जुटेगा, हथियारों की कमी न होगी,
लेकिन अपने लेखे इसको, हर्ष न होगा, गमी न होगी।
सबके दुख में दुखी रहेगा, सबके सुख में सुख मानेगा
समझ बूझकर ही समता का, असली मुद्दा पहचानेगा।
अरे देखना इसके डर से, थर थर कांपेंगे हत्यारे,
चोर उचक्के गुंडे डाकू, सभी फिरेंगे मारे मारे।
इसकी अपनी पार्टी होगी, इसका अपना ही दल होगा,
अजी देखना इसके लेखे, जंगल में ही मंगल होगा।
श्याम सलौना यह अछूत शिशु, हम सबका उद्धार करेगा
आज यही संपूर्ण क्रांति का बेड़ा सचमुच पार करेगा।
हिंसा और अहिंसा दोनों, बहनें इसको प्यार करेंगी
इसके आगे आपस में वे, कभी नहीं तकरार करेंगीं।
इसना कहकर उस बाबा ने, दस दस के छह नोट निकाले
बस फिर उसके होठों पर थे, अपनी उंगलियों के ताले।
फिर तो उस बाबा की आंखें, बार बार गीली हो आईं
साफ सिलेटी हृदय गगन में, जाने कैसी सुधियां छाईं।
नव शिशु का सिर सूंघ रहा था, विह्वल होकर बार बार वो
सांस खींचता था रह रह कर, गुमसुम सा था लगातार वो
पांच महीने होने आये, हत्याकांड मचा था कैसा?
प्रबल वर्ग ने निम्न वर्ग पर, पहले नहीं किया था एसा|
देख रहा था नवजातक के, दायें कर की नरम हथेली
सोच रहा था इस गरीब ने, सूक्ष्म रूप में विपदा झेली
आड़ी तिरछी रेखाओं में, हथियारों के ही निशान हैं
खुखरी हैं बम हैं असि भी है, गंडासा भाला प्रधान हैं
दिल ने कहा- दलित मांओं के, सब बचे अब बागी होंगे
अग्निपुत्र होंगे वे अंतिम, विप्लव में सहभागी होंगे।
दिल ने कहा अरे यह बच्चा, सचमुच अवतारी वराह है
इसकी भावी लीलाओं का, सारी धरती चरागाह है।
दिलने कहा अरे हम तो बस, पिटते आये रोते आये
बकरी के खुर जितना पानी, उसमें सौ सौ गोते खाये।
दिल ने कहा अरे यह बालक, निम्न वर्ग का नायक होगा
नई ऋचाओं का निर्माता, नये वेद का गायक होगा।
होंगे इसके सौ सह योद्धा, लाख लाख जन अनुचर होंगे
होगा कर्म वचन का पक्का, फोटो इसके घर घर होंगे।
दिल ने कहा अरे इस शिशु को, दुनियां भर में कीर्ति मिलेगी
इस कलुये की तदबीरों से, शोषण की बुनियाद हिलेगी।
दिल ने कहा अभी जो भी शिशु इस बस्ती में पैदा होंगे
सब के सब सूरमा बनेंगे, सब के सब ही शैदा होंगे।
दस दिन वाले श्याम सलोने, शिशु मुख की यह छटा निराली
दिल ने कहा भला क्या देखें, नजरें गीली पलकों वाली।
थाम लिये विह्वल बाबा ने, अभिनव लघु मानव के मृद पग
पाकर इनके परस जादुई, भूमी अकंटक होगी लगभग
बिजली की फुर्ती से बाबा, उठा वहां से बाहर आया
वह था मानो पीछे पीछे आगे थी भास्वर शिशु छाया
लौटा नहीं कुटी में बाबा, नदी किनारे निकल गया था
लेकिन इन दोनों को तो अब, लगता सब कुछ नया नया था
(दो भाग इस में समाहित हैं, शेष भाग के लिये यहां माउस किलकायें। )
Filed under: कविताई, बाबा नागार्जुन | 10 Comments
शिल्पा जी
धन्यवाद. आते ही आपने बेहतरीन सामग्री की झड़ी लगा दी है. साधुवाद.
वाह चलिये आपने बुरो को अच्छा रास्ता दिखाने की एक और कोशिश की ,खुदा आपको कामयाबी दे
क्या बात है… कविता में भविष्य का इतिहास कैसे लिखा जाता है, हरिजनगाथा इसकी मिसाल है। रचनाकार में समाजदृष्टि और इतिहासदृष्टि ऐसी ही होनी चाहिए।
इतनी अच्छी रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
धन्यवाद घुघुती बासूती जी, अनामदास जी और अविनाश जी
अरुण जी; सबसे बुरे तो हम खुद हैं और रास्ता भटके हुये हैं, किसी को क्या रास्ता दिखायेंगे?
आपने बाबा की एक कविता की फरमायश की है, उसे जरूर बांचेंगे.
यह रचना यहां उपलब्ध करवाने के लिए आपका आभार
आख़िर हरिजन गाथा आ ही गयी . मैने आज इसे खोज लिया था . फिर भी ब्लॉग पर लाने के लिए साधुवाद
अच्छी लगी बाबा की ये रचना.