कल “शहीद भगत सिंह और साथियों के दस्तावेज” में तब के कम्युनिस्ट आंदोलन पर भगतसिंह के विचार को पढ़ते समय मुझे बाबा नागार्जुन की एक कविता ध्यान आयी और वो कविता मैंने अपने चिठ्ठे पर प्रस्तुत कर डाली। इस कविता पर एक प्रतिक्रिया आयी कि “बाबा की यह कविता नासमझों के लिये नहीं हैं”।

अधिकतर लोग किसी भी कविता लेख या इन्टरव्यू को जब बदनीयत से पेश करते हैं तो वे उस पर अपनी लम्बी चौड़ी टिप्पणी चप्पी कर देते हैं पर मैंने ये कविता बिना किसी लब्बो-लुआब के पेश की थी इस प्रतिक्रिया के बाद मैंने बाबा नागार्जुन की एक और कविता सुना डाली।

इस पोस्ट पर रेयाज- उल-हक जी की निम्न टिप्पणी आयी
“यह तो हद हो गयी। आप बाबा को इस नीयत से पेश कर रही हैं मानों वे कम्युनिज़्म के धुर विरोधी थे। अविनाश ने सही कहा, यह कविता उनके लिए तो नहीं ही है जो कम्युनिज़्म को भीतर से नहीं जानते और कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच के मतभेदों को नहीं जानते। कविता भाकपा-माकपा जैसी आडंबरी कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए है। इसे सीधे कम्युनिस्ट विचारधारा से जोड कर नहीं देखना चाहिए।बाबा आडंबरों के पक्ष में नहीं थे और दोनों कविताएं इसके खिलाफ़ हैं।”

रेयाज-उल-हक जी, बाबा की कौन सी कविता समझदारों के लिये है और कौन सी नासमझों के लिये ये क्या ये आप मिल बैठ कर तै करेंगे? क्या बाबा लिख कर अपने गली, मोहल्लेवालों या शहरवालों को ये ठेका दे देते थे कि वे मिल बैठ कर तै करें कि कौन सी कविता को समझदार और कौन सी को नासमझ पढ़ें? अगर एसा है तो आप मुझे उस ठेके की परची दिखाईये ? परची दिखाने से पहले बाबा की इधर उधर छपी फैली बिखरी रचनाओं पर काबू कीजिये कि ये और नासमझों के हत्थे न चढ़ें।

आपकी बातों से तो एसा लगता है कि बाबा की कविता पढ़ने के लिये मुझे कम्युनिज्म को भीतर से जानने की कोई परीक्षा-वरीक्षा पास करनी होगी फिर उसके वाद में आपके यहां प्रार्थना पत्र देना होगा कि मैंने अलां-फलां-बलां परीक्षा पास करली है और मुझे बाबा की कविताई पढ़ने की सादर अनुमति प्रदान की जाय।

रेयाज-उल-हक जी किसी भी धर्म, वाद या विचारधारा के दुश्मन उसके फालोअर या पिछलग्गू ही होते हैं। यही लग्गू, तग्गू बाद में ठग्गू बनकर अपनी दुकानें चलाने लगते हैं। यही गांधी, मार्क्स, हर वाद, हर विचारधारा, हर दर्शन के साथ होता आया है। आप भी इन ठग्गुओं की दुकानें देखते रहे हैं।

लोग धर्म और विचारधारा के साथ एसा करते आये हैं। बाबा नागर्जुन एक जनकवि है। किसी जनकवि के लिखे के साथ एसी ठेकेदारी मत कीजिये

वैसे तो मेरा इस जगह बाबा की हरिजन गाथा पढ़वाने का इरादा था। पर अब जब तक कि आप कोई क्लियर चिट नहीं दे देते, मेरी ये कविता झेलिये।

अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बों
ये पढ़वाओ
उसको लाओ
इसको खैंचो
उसको पटको
क्रांति-भ्रांति को मिलकर गटको
चलो मचाओ चिल्लकपों
अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बों

बात करें खिचड़ी विप्लव की
बात करें अब की जब-तब की
बात करें हम फूलमती की
बात करें हम अरूंधती की
बात करें हम काश्मीर की
बात करें फाड़ी धजीर की
बात करें हम जुल्म सितम की
बात करें हम टाइम बम की

अस्सी नब्बे पूरे सौ
अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बों



12 Responses to “अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बों”  

  1. शिल्पा जी, आप नैतिक रूप से सही हैं.. किसी को ये हक़ नहीं कि वो ये तय करे कि दूसरे क्या पढेंगे और क्या नहीं.. नगार्जुन की कविताओ पर आपका भी उतना ही हक़ है जितना किसी और का.. और उनकी काव्य परम्परा पर आपका हक़ तो आपने अपनी कविता से सिद्ध भी कर दिया.. आप धारदार लिखती हैं.. लिखती रहें..

  2. 2 rahul

    हा हा हा हा !! संशय ख़त्म . आप ऐसे ही लिखती रहें . कोई भी कमुनिज्म का ठेकेदार नही है … हो ही नही सकता . अगर कोई ऐसी बात करता है तो वह बेवकूफ़ है . और अगर निर्मल अभय आनंद की भाषा में कहें तो ” आपकी बातों से ईमानदारी की बू आती है .. ये बू हमे बहुत पसंद है ..”

    और हाँ .. देखता हूँ अगर हारिज़न गाथा मेरे पास हुई तो पढ़ लूंगा और अगर ना हुई तो उसे जल्दी से पोस्ट करिये …इंतज़ार है

  3. टिप्पणी का जवाब तो शानदार लेकिन आपकी कविता तो गज़ब!!

  4. ईमानदारी से कहूँ तो आपकी पीठ ठोकने की इच्छा होती है. क्या खुब लिखा है! साधूवाद स्वीकारें.

  5. 5 kakesh

    वाह वाह वाह … इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता. इसे कहते हैं “नहले पे दहला” ना ना जी “दुग्गे पे इक्का” .. और आपकी कविता…पहले तो लगा कि बाबा की ही है..पर फिर जब समझ आया कि आपकी है…तो बस मजा आ गया.. पढ़ती रहें ..लिखती रहें…

  6. धन्यवाद अभय जी एवं राहुल जी, संजीत जी; बाबा पर हमारे भी हक की स्वीकृति के लिये। ध्न्यवाद संजय जी.
    @काकेश जी; ये कविता वबिता नहीं है और न कोई जबाब। बस उदगार थे, बोल डाले।

  7. बाबा पर हक तो सभी का है, उसे कोई कैसे छीन सकता है. मगर बाबा की रचनाओं का गलत उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. आप उनको इस तरह कम्युनिज़्म के खिलाफ़ नहीं खडा़ कर सकतीं. और हम अब भी कहेंगे कि बाबा की जिन कविताओं को पेश कर रहीं हैं वे नासमझों के लिए नहीं हैं.
    और केवल हरिजन गाथा ही नहीं, बाबा की कई और कविताएं भी हैं जिन्हें आपको ‘सुनानी’ चाहिए.

  8. रेयाज-उल-हक जी; कौन नासमझ है?
    मैं या हिन्दी के पाठक ?
    किन से बचाकर रखें बाबा की कविताओं को?

  9. शिल्पाजी आपको हार्दिक साधुवाद। क्या जवाब दिया है आपने। वामपंथी भाई तिलमिला गए है।

  10. रेयाज़, ये अनुमति कौन किसको देगा? मैंने कल आपसे कहा था कि बाबा सबके थे। ये उनकी कविताओं का कमाल है कि सबको उसमें अपनी अभिव्‍यक्ति नज़र आती है। शिल्‍पा बाबा की कविताओं की मुरीद है। अब ये उनका मसला कि उन्‍हें बाबा की कौन सी कविताएं सबसे ज्‍यादा अच्‍छी लगती हैं। वैसे मैं आपको बताऊं, बाबा अपनी ही कई कविताओं को बाद में नापसंद करने लगे थे और उन्‍हें सुनाने से परहेज़ करने लगे थे। लेकिन इससे क्‍या फर्क पड़ता है? तीर कमान से निकल गया तो निकल गया!

  11. रेयाज़ आप सेंसर बोर्ड से हैं..या कल्चरल पुलिस हैं.. या गेस्टापो..?ये क्या भाषा है..? कि अनुमति नहीं दी जा सकती..? ज़रा दो मिनट रुक कर सोचिये.. आप कैसी फ़ासीवादीना बात कर रहे हैं.. आप तय करना चाहते हैं कौन क्या कब कैसे किस सन्दर्भ में किसके लिये पढेगा..? आप को लगता है कुछ और कवितायें सुनानी चाहिये तो आप सुनाइये.. दूसरों को धकेल रहे हैं कि आप ये कर रहे हैं तो साथ में ये भी करिये.. नहीं तो हम नहीं अनुमति देंगे.. ?आप होते कौन हैं अनुमति देने वाले.. ? आप के पास कोई विशेष अधिकार हैं जो दूसरों के पास नहीं है.. आप तो सत्ता में भी नहीं है.. और अगर आप को सत्ता मिल गई तो आप में और उन लोगों में क्या अन्तर होगा जो ये तय करना चाहते हैं कि चन्द्रमोहन की पेंटिग आम जनता के देखने के लायक नहीं है.. या सैटेनिक वर्सेस जनता के पढ़्ने के लायक नहीं है.. या जेम्स लैन की किताब आम लोग तक नहीं पहुँचनी चाहिये.. ?

  12. क्या ये वही रेयाज हैं जो ‘हाशिया’ पर चंद्रमोहन और हुसैन के लिए दुबले हुए जा रहे हैं ? और यहां लगभग नीरज जैन जैसी मुद्रा में नमूदार हैं. यानी एक रेयाज के भीतर दो रेयाज . कमाल है .


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