(बाबा नागार्जुन से पहली बार मेरा साबका दिल्ली में कमानी आडिटोरियम के बाहर हुआ था। वे जमीन पर बैठे थे और मैंने उन्हें पहचान लिया था। उनके चरण स्पर्श करके बस कुछ बात होने वाली ही थीं कि नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के कुछ स्टूडेन्ट आ गये थे और बाबा को ले गये थे। बाबा की यह कविता कम्युनिज्म के पंडे उन पलों की स्मृति को प्रस्तुत है)।

आ गये दिन एश के!
मार्क्स तेरी दाड़ी में जूं ने दिये होंगे अंडे
निकले हैं, उन्हीं में से कम्युनिज्म के चीनी पंडे
एक नहीं, दो नहीं तीन नहीं, बावन गंडे
लाल पान के गुलाम ढोयेंगे हंडे
सर्वहारा क्रांति की गैस के
आ गये अब तो दिन ऐश के

ठी-ठी-ठी
मचा रहे ऊधम बहोत
शांति के कपोत
पीले बिलौटे ने मार दिया पंजा
सर हुआ घायल लेनिन का गंजा
हंसता रहा लिउ शाओ ची
फी-फी-फी



20 Responses to “कम्युनिज्म के पंडे”  

  1. हां, बाबा की इस कविता को बहुत सारे लोग कम्‍युनिज़्म के खिलाफ हथियार की तरह इस्‍तेमाल करते रहे हैं। जैसे अगर आज कोई बंगाल का विरोध करता है, तो उसे कम्‍युनिज्‍म का विरोधी कहा जाता है। जबकि किसी विचारधारा के अर्थ के विरोध और उससे जुड़ी तथाकथित व्‍यवस्‍था के विरोध में फर्क करना आना चाहिए। बाबा की ये कविता नासमझों के लिए नहीं है।

  2. अविनाश जी, मैंने तो बस ये कविता प्रस्तुत की है। आप इसको हथियार के रूप में क्यों देखते हैं। चलिये बाबा की दूसरी कविता के अंश सुनिये। शायद ये कविता नासमझों के लिये हो।

    हां साब, हमने एसी एक्टिंग बहुत देखी है.
    हवा में इस तरह मुठ्ठियां उछालते हो
    साफ साफ बतला दो हमें
    कि फलां फलां यानी अमुक – तमुक – ढमुक
    तुम्हारे जानी दुश्मन हैं
    किसी भी हालत में उन्हें तुम माफ नहीं करोगे
    आठौं पहर उनको परेशान किये रखोगे
    ……
    आखिर बतला दो, वे कौन कौन से लोग हैं
    खूंखार दरिंदे हैं
    कि आदमजाद नहीं हैं, शैतान के नाती पोते हैं

    हां साब, हमने एसी एक्टिंग बहुत देखी है
    ओफ, इस कदर
    मुतवातिर मुट्ठियां उछालना
    पसीना-पसीना हो उठना इस कदर
    इस कदर फुफकारना
    सुराहीनुमा नफीस गरदन
    पीछे की तरफ इस कदर झटक लेना
    उस कदर होंठ फड़फ्ड़ाना
    नथुने फुलाना इस कदर
    आफ्फोह, बहुत देखी है हमने एसी एक्टिंग

    प्लीज बतला दो उस जालिम का नाम
    मुझसे अब नहीं जाती देखी तुम्हारी गुस्से की यह एक्टिंग

  3. 3 kakesh

    सही जबाब…दोनों कविताऎं अच्छी हैं हम जैसे नासमझों के लिये.. बाकी ऎसे ही लिखते रहें…

  4. अरे काकेश जी एवं अविनाश जी; “नासमझों के लिये” से मेरा तात्पर्य स्वयं से था। आखिर ब्लाग का मतलब तो वेबलाग होता है ना।
    गलत न समझ लीजियेगा।

  5. बाबा नागार्जुन जी की दोनो कविताए पढ कर बहुत अच्छा लगा।उअन की रचना यहाँ देने के लिए आप का बहुत-बहुत धन्यवाद।

  6. अच्‍छा हो, बाबा की कविता हरिजन गाथा कविता भी आप यहां बांचें।

  7. अविनाश जी, बेलछी कांड पर लिखी हरिजन गाथा तो मेरी प्रिय रचनाओं में शामिल है। वह भी जरूर बांची जायेगी।

  8. शुक्रिया दोनों कविताएं यहां उपलब्ध करवाने के लिए

  9. शुक्रिया! दोनों कवितायें पढ़वाने के लिये!

  10. 10 rahul

    आपकी भावना का तो पता नही इसलिए बहस मे नही पडूँगा , लेकिन बाबा की यह कविता बहुत अच्छी है

  11. यह तो हद हो गयी. आप बाबा को इस नीयत से पेश कर रही हैं मानों वे कम्युनिज़्म के धुर विरोधी थे. अविनाश ने सही कहा, यह कविता उनके लिए तो नहीं ही है जो कम्युनिज़्म को भीतर से नहीं जानते और कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच के मतभेदों को नहीं जानते. कविता भाकपा-माकपा जैसी आडंबरी कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए है. इसे सीधे कम्युनिस्ट विचारधारा से जोड कर नहीं देखना चाहिए.बाबा आडंबरों के पक्ष में नहीं थे और दोनों कविताएं इसके खिलाफ़ हैं.

  12. शिल्पाजी

    धन्यवाद हम नासमझो (साम्यवाद के आलोचको ) के लिये इन कविताओ को प्रस्तुत करने के लिये !

  13. @अनूप शुक्ल जी धन्यवाद इस चिठ्ठे पर माउस क्लिक करने के लिये।
    @ परमजीत बाली जी, हौसला अफजाई के लिये धन्यवाद।
    @राहुल जी, मैंने तो सिर्फ कविता पेश की है, अन्य लोगों की तरह इसमें लबे-चौड़े पुंछल्ले भी तो नहीं लगाये. आपको पसंद आयी, धन्यवाद।
    @आशीष जी, शादी की बधाई, आपतो हमारे प्रदेश के जवांई है. आपकी नई नई शादी हुई है, जरा ब्लाग कम देखा कीजिये। (मगर एसा होगा नहीं। वन्स ए ब्लागर – आलवेज ब्लागर)
    @रेयाज-उल-हक जी, आपके आने का धन्यवाद लिखने के लिये तो एक पूरी पोस्ट लिखी जानी चाहिये।

  14. 14 kakesh

    शिल्पा जी : गलत नहीं समझे..कितने ही नासमझ हों हम..अपने बारे में कोई भ्रांति नहीं है ..इसलिये हम तो खुद को कविता के मामले में तो नासमझ ही मानत हैं :-) ..अब देखिये स्माइली लगा दी है…

  15. अरे, गदर! बाबा नागार्जुन को कभी गंभीरता से पढ़ा नही. अब पढ़ना पड़ेगा. वैसे दिनकर जी की “एनारकी” भी बड़ी पते की कविता है. 1962 में लिखी होगी पर आज भी वैसा ही लगता है!

  16. 16 arun

    नागार्जुन जी कै कविताये फ़िर से पढाने का शुक्रिया,पर आप जरा समझदारो से पहले पूछ लिया कीजीये की उनको ये सूट करेगी या नही ,नही तो उनके मिर्ची लगेगी

  17. आपने बाबा नागार्जुन की अच्छी कविताएं प्रस्तुत की है। बाबा सत्य के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने वामपंथियों के दोहरे चरित्र की जमकर खबर ली है।

  18. शिल्पा जी
    दर असल, कम्यूनिस्ट और भगवाधारी दोनों ही अधीर और हिंसक हैं, जरा सी भी आलोचना इन्हें बरदाश्त नहीं होती..मै ही सही हूँ और सारी दुनिया गलत है यह इनका मानना होता है, आपने नागार्जुन को उल्लेखित किया तो वह भी इन्होंने “दिल” पर ले लिया, यदि आपने हेडगेवार को उल्लेखित किया होता तो हो सकता है कि ये लोग आपके घर पर पथराव कर देते…बाकी रही बात ब्लॉग की.. बहुत ही बढिया लिखा है, लगे रहिये और ऐसे ही लगे रहिये कि कईयों को “मिर्ची” लगती रहे…साधुवाद..

  19. अब भाई अविनाश जी ही हिंदी की दुनिया के अकेले समझदार हैं। बाकी लोगों को तो कुछ समझ में आता ही नहीं।


  1. 1 अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बों « शिल्पा शर्मा का चिठ्ठा

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