शहीद भगत सिंह के 1928 में लिखे लेख का एक हिस्सा पढि़ये.

“साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं वे अखबार वाले हैं।
पत्रकारिता का व्यवसाय जो किसी समय ऊंचा समझा जाता था आज बहुत गन्दा हो गया है ये लोग एक दूसरे के विरुद्द बड़े मोटे मोटे शीर्षक देकर परस्पर सिर फुटौव्वल कराते हैं। एक-दो जगह ही नहीं कितनी ही जगहों पर इसलिये दंगे हुये हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं।”
“भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज - पेज 218 प्रकाशन राजकमल प्रकाशन”

क्या आपको एसा नहीं लगता कि आज के अखबार वालों के बारे में लिखा जा रहा है?



5 Responses to “शहीद भगत सिंह और अखबार वाले”  

  1. 1 Sanjeet Tripathi

    हा हा, मतलब यह कि बीमारी नई नहीं बल्कि पुरानी ही है

  2. 2 अविनाश

    bilkul prasangik lagataa hai…

  3. 3 अभिनव

    भगत सिंह जी के विचार हम तक पहुँचाने हेतु धन्यवाद। आपके लेख का लिंक यहाँ, इस कड़ी पर भी प्रेशित कर दिया है।

  4. 4 संजय बेंगाणी

    :) जब बिमारी पूरानी हो जाती है, तो उसका ईलाज भी मुश्किल हो जाता है. भारत को कोई मोटी जमड़ी के पत्रकारों से बचाए.

  1. 1 गुजरात में टैक्सी वाले ने हमें जबरन नीचे उतार दिया « शिल्पा शर्मा का चिठ्ठा

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