स्त्री
कहते हैं
खुदा ने बनाया इसे,
आदमी के शरीर से अलग करके,
शायद आदमी जैसी ही होगी ये
खुश होती होगी, मचलती होगी,
रोती होगी,
इसे भी दर्द होता होगा,
ये भी कराहती होगी.
लेकिन तुमने रखा इसे.
व्यक्ति की परिभाषा से बाहर
रास्ते चलती औरत पर
तुम कसते रहे ताने,
छेड़ते रहे, खरीदते रहे, बेचते रहे,
तुम्हारे लिये ये है पण्य़ वस्तु
तुम्हारी मां या बहिन
तुम्हारे लिये पूज्यनीय है
भोग्या तो नहीं है.
लेकिन तुम आज
इतने आगे बढ़ गये हो
बनाते हो चित्र,
रतिमुद्राओं की कुत्सित कल्पनाओं के,
बच्चा जनने के नितान्त व्यक्तिगत पलों के,
स्त्रीत्व के नंगे शरीर के,
और नाम देते हो अपनी मां का.
क्यों?
ताकि तुम्हारे चित्र बिक सकें,
हासिल हो सके तुम्हे
सोना, धन, मुद्रा,
क्यों?
अब तुम्हारे लिये,
तुम्हारी मां भी बन गयी है भोग्या
पण्य़ वस्तु!
कैसे बेटे हो तुम ?
अपनी मां के विक्रय पर
अगर तुम्हारी आस्था दरकेगी
तो कूट डालोगे उसे.
क्योंकि आस्था भी तो एक स्त्रीलिंग है
हन्या है.
वाह!
मांओं के विक्रेताओ;
आदमी से दुबारा बन्दर बनने का सफर
खूब तय किया है तुमने.
काश, तुम बन्दर ही रहते,
आदमी तो न बनते.
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