कितने सारे पासवर्ड याद रखें?
नेट जाल अब जंजाल बनता जा रहा है. हर वेबसाईट चाहती है कि हम उसे अपनी ई-मेल पता थमा दें. ई-मेल की सेवा देने वाली वेबसाइट पर हम लागिन कर सेवा प्रयोग करें तो ठीक था पर अब हर एक एरा गैरा नत्थू खैरा चाहता है कि हम उस पर लागिन करके ही उसकी सेवा का लाभ उठाये तो ये कहां तक सही है?
टैक्नोराती, डिग वगैरह की बात छोड़िये अब तो न्यूज पोर्टल तक चाहती है कि उसे अपनी ई-मेल पता जरूर जरूर थमायें और फिर बाद में आनेवाली अनचाही ई-मेल की बाढ़ झेलने के लिये तैयार रहें.
इन लागिन के झमेले से मुक्ति का कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही होगा.
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लो समझ लो बात
आज सुबह 8.30 को इस ब्लोग की एक पोस्ट में शब्द का 31 agst, 2007 shukrawaar उपयोग किया गया. और गूगल सर्च में यह केवल पांच घंटे बाद 1.30 पर शामिल हो गया है। नीचे फोटो देखिये
ये पोस्ट उस एग्रीगेटर में नहीं दिखी जिसके गुड़गान बखाने जा रहे थे।
कल ये शब्द बारमेड पोलीस की एक पोस्ट में आये और सिर्फ नारद मे दिखे लेकिन गूगल में कुछ ही घंटो बाद शामिल कर लिये गये।
तो मतलब;
हाथ कंगन को आरसी क्या
डुगडुगी बजाने पे न जाओ
अपनी अक्कल लड़ाओ.
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Oh Narad Naaaaraad
अगर अलाने फलाने एग्रीगेटर से ही गूगल बाबा दिन में दो बार आपके ब्लाग पर घूम जाते है तो इस पोस्ट को गूगल में सर्च कीजिये
“31 agst, 2007 shukrawaar”
ये गूगल में कैसे उपस्थित है जबकि ये किसी अलाने फलाने एग्रीगेटर में नहीं है, ये तो सिर्फ नारद में ही है.
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